Thursday, 19 May 2022

बचपन

 बचपन

कैसा था वो बचपन  जिसमे हम गिरते , पड़ते और खुद ही रोती आँखें मलते संभल जाते थे ।


हाँ उसी बचपन की बात कर रही हूँ , जब मिट्टी के घर बनाकर उसे कई तरह से सजाते थे , याद है  ना ?


हाँ वही , जिसमे किसी की भी डाट से दिल उदास नहीं  होता था , जब हर बच्चा माँ के आँचल मैं  सिर रखकर सोता था। 


जब खिलखिलाहट घर के हर कोने को रोशन करती थी , जब खुद के घर में अपनी आवाज़ कभी नहीं गूंजती  थी। 


वही बचपन जिसमे नानी दादी के कई किस्से , और किसी भी चीज़ को खाने में उसके बराबर हिस्से होते थे।
हम्म हम्म वही प्यारा बचपन। 


जब अपनों को अपनेपन का एहसास नहीं दिलाना  पड़ता था ,जब दूरियां दिलो की नहीं ,बस मीलों की होती थी। 


आज भी जब याद करती हूँ उन दिनों को तो दिल ख़ुशी से झूम उठता है,

 
वो वक़्त  मानो ज़ैसे कुछ  यादों में सिमट सा  गया है , लेके जैसे मेरा  सारा जहां लिपट सा गया है।

 
वक़्त  लौट नहीं सकता ये सब जानते है ,हम कितना भी कोशिश करें पर यादो से कहाँ निकल पाते है। 


आज उनमें से कुछ यादो को शब्दों में लिख रही हूँ , ऐसा लग रहा है मानो
जैसे बचपन में , मैं लौट रही हूँ ।

                                                                      
 
                                                                                                ज्योत्स्ना

Thursday, 4 May 2017

मोह का जाल

                             मोह का जाल तुझे उलझता चला है ,
                                                                    
                                                                    तू भूलता सदैव अंत में सब राख में मिला है। 

                           बढ़ता रहा मोह, मन माया रुपी मोह से भरा है,

                                                                   जबकि नश्वर वस्तुए तो क्या , ये शरीर भी न तेरा है। 

                           कभी ईर्ष्या, कभी  द्वेष ,कभी अहंकार से तू भरा है ,

                                                                    मत भूल की अंत में तू अपने कर्मो से ही तरा है। 

                           कागज़ के चाँद टुकड़ो को , तू प्रेम उल्लास  समझता है , 

                                                                   वंचित है जो उससे , उसे न खास समझता है। 

                            कभी अहंकार, तो कभी मन को स्वार्थ से भरता है,

                                                                   पर जानले , कि ऊपर वाला भी तुझे तेरे कर्मो से तोलता है। 

                           लेता है बेर, तो कभी  मन में, रंजिशे रखता हैं , 


                                                                    न मानता है कि माफ़ करने वाला हे बड़ा होता है। 

                          जब अंत तेरा आएगा कुछ भी न रह जायेगा ,


                                                                     तेरा स्वाभाव ही तेरे अपनों के बीच एक छाप छोड़  जायेगा। 

                           न कागज़ के टुकड़े , न अपार संपत्ति तू अपने संग ले जायेगा, 


                                                                     वहा तो तू, खाली  हाथ और पैदल ही जयेगा। 

                           ये व्यर्थ का अहंकार और लालच छोड़ दे ,

                                                                     ये न कभी तेरे काम आएगा।

                           बस निस्वार्थ प्रेम बाँटता चला जा , 

                                                                      तू सब के दिलो में ,घर कर जायेगा। 

   
                                                                                                                                ज्योत्स्ना सुयाल 

चिरैया

ये वही  नन्ही सी गुड़िया है,  जिसने हमेशा खुशिया  ही बाटी है ,

ये वही चिरैया है , जो कभी अपना घर तो कभी अपनों को छोड़कर आयी है। 

ये तो वो कली है , जो कभी खिलने से पहले हे तोड़  जाती है,

ये तो इतनी भली है , की जो जानकार भी हर दर्द सह जाती है। 

कहते तो है, कि  इसके होने से ही घर में लक्ष्मी आती है ,

फिर भी ये, दुनिया में आने से पहले ही गर्भ में मार दी जाती है। 

जन्म ले भी ले, तो दुनिया इसे  बड़ा सताती है ,

 इसके तो कपड़ो से भी इसके चरित्र की तुलना की जाती है। 

ये तो वो रौशनी है, जो अंधेरो को उजालो से भर देती है ,

फिर भी ,कभी प्रताड़ित, तो कभी आग में झोक दी जाती हैं। 

ये तो वो है ,जो आज चाँद तक भी जाती है , तो ये वो भी है, जो घर आँगन सजाती है। 

कभी गौरव पूर्ण कहानी तो कभी  मिसाल बन् जाती है,   

पराक्रमी है ,ये तो  तूफानों से भी लड़ जाती है।  

इसका अपमान करने वाला सदैव आग में हे जला है ,

ये कभी दुर्गा तो कभी काली बन जाती है। 

भूल के भी, कभी इसका निरादर न करो ,

क्योंकि ये वही है, जो हमें ये सुंदर संसार दिखती है। 






Sunday, 16 October 2016

वीर



 पैदा हुआ मैं चिराग बन , परिवार का वारिस बना । 
 मेरी किलकारियां सुन  सभी ने,कई सपनो को बुना। 
 
जवां हुआ तो माँ बाप के सहारे की उम्मीद बना ,
उम्मीद तोड़कर उनकी ,मैंने भारत की  सरहद को चुना। 
 
नम्म आँखों से वो भी बोले करनी है रक्षा अब उसकी ,
माँ है वो तेरी ,खेला  है तू गोद में जिसकी। 
 
गोली ,बारूद, बेकसूरों के लहू से जो कराह रही है,
 वो धरती माँ आज अपने जवानों को बुला रही है। 
 
आज मैं सरहद पर खड़ा हूँ ,न जाने ,कब कहाँ  कितने युद्ध में लड़ा हूँ । 
न दूंगा उसका अंश ,  ढाल बन मैं खड़ा हूँ। 
कल भी लड़ा था आज भी अडिग हूँ ,अपनी भारत माँ का मैं वो वर पुत्र हूँ। 
 
सबूत मांगता आब मुल्क है ,मुझसे ,उस वीरता के युद्ध का। 
सुकून ,उसका परिणाम  हैं ,वो जानकार भी अनजान है। 
 
वीरगति मिल जाये ऐसे रक्षा का प्रण लेते हैं,
खुद को समर्पित कर,अपनी इच्छाओ की आहुति हम देते हैं। 
 
न दीवाली, न होली, न कोई त्यौहार है ,खुशहाल भारत ही मेरी माँ का हार है। 
 
बर्फीली हवा,कड़कती धूप का भी ,अब कोई असर न होता हैं मुझमे,
आखिरी सांस तक भी दुश्मनो से यही बोलती है ,आ अगर दम है तुझमे।
 
मैं रातो को भी जागता हूँ , ताकि मेरा भारत सो सके,
मैं बम गोलियों का भी करता सामना हूँ ,ताकि मेरा भारत खुशियों  किलकारियों से गूँज सके। 
 
हर क्षण ,मेरी लहूलुहान वर्दी मुझे गर्व से  यही बोलती है ,
तूने सदैव ही खुद को साबित किया है,धरती माँ भी ख़ुशी से डोलती है। 
 
तू वीर तू जवान है , तू हम सबके लिए मिसाल है। 
तुझसे सबूत मांगने वाला ,मंदबुद्धि इंसान है। 
तूने जीने जितना काबिल रखा ,जानते है सब, फिर भी अनजान है। 
 
तू मरकर भी अमर है ,तू फ़ौजी तू शहीद है। 
तू देश का,  वो पुत्र है , जिसका कुटुंब पूरा देश है। 
 
तू हर अबला का वो भाई है , तू रक्षक तू सिपाही है ,
तू निस्वार्थ है तू साहसी है , तू इस देश का ही एक वासी है। 
 
तू मरते दम तक, भारत माँ की जय दोहराता है ,
तेरे पार्थिव शरीर पर भी ,विजय तिरंगा लहराता है। 
 
तू शौर्य तू पराक्रम है ,तू योद्धां तू विक्रम है। 
 
तूने भारत को सदैव दिया अमन है,
भारत के सभी वीरो को मेरा  शत-शत  नमन है।  
 
 
                                                                                                                                 ज्योत्स्ना 
 
                                                                                                                 







                              


                            

                         

              
 

           



 

Thursday, 15 September 2016

तुझ जैसा कोई नहीं ऐ माँ

तुझे वीरता की मिसाल कहूँ  , या ममता की एक मूरत ,
तुझे अँधेरे मैं जलता एक चिराग कहूँ , या रिश्ता वो सबसे खूबसूरत।

तू किस मिटटी की बनायीं गयी है ,इस बात से मेरा मन  व्याकुल  होता है,
ये सोचती हूँ  कभी , कि क्या दुनिया में कोई और रिश्ता भी इतना खूबसूरत होता है ,

हाँ, आज तू प्रबल है, बलशाली है ,तेरे जीवन में अपार खुशहाली है ,
पर इंतज़ार में बैठी वो बूढी माँ,यही सोचती है।

धन दौलत से कई रिश्तो को खुश कर लेगा तू ,
 पर माँ की ममता का न कोई मोल है, क्योंकि वो तो इस जग में ससबसे अनमोल है।

तेरी एक मुस्कान हे उसका पूरा जहां है, उसका दर्ज़ा तो दुनिया में सबसे ऊपर और महान हैं।

तेरी आहट को भी वो यूँ भाप लेती है, हमें खुशिया देती है भले ही अपना जीवन कष्टो में काट लेती है।
 वो कल भी दो साड़ियों में खुश थी, आज हज़ारो मैं भी उसकी ममता न बदली है।

उसे कल भी तेरी फ़िक्र थी , आज भी तेरे खुश रहने की दुआ वो करती है।

माँ का क़र्ज़ आज तक न कोई चुका  पाया हैं , वो तब भी लाड करती है ,
भले ही, उसके लाडले ने उसका दिल दुखाया है।

कभी भूलके भी ,तू उस माँ को न रुलाना , जब भी बुलाये बस तू उसके पास चले जाना।
उसकी गोद  में सिर  रख कर बस ये पूछ लेना ,माँ तू कैसी  हैं , कही तुझे कोई दुःख तो नहीं ,ये मुझे बताना।

वो भूकी है प्यार की धन दौलत की नहीं ,रो देगी वो इस बात पर चाहे दुःख हो या नहीं।
पोछकर वो आंसू तू उसे गले लगाना।

तुझ जैसा प्यारा और सच्चा कोई नहीं माँ , ये उन्हें बताना।
चाहे तुझे कुछ भी कहे ये ज़माना , तू अपनी  माँ को अपने साथ हे ले जाना।


                                                                                                                               ज्योत्स्ना सुयाल



 

जब अनजान थे.......

जब अनजान  थे तब ही खुश थे , जब जान लिया तो वजह ढूंढने पर मज़बूर हो गए। 

जब न था पता की खुश होने की कोई वजह भी होती है ,

                                                           जब जान गए तो अब  हर ख़ुशी की वजह ही होती है। 

वो बचपन ही शायद अच्छा था , वो किताबो और पढाई का बोझ ही  अच्छा था,
                                           आज वजह ढूंढकर लोग अपनाते है ,तब तो अपना हर दोस्त सच्चा था।  

तब तो रोते  रोते भी हँस देते थे ,आज तो गीली आँखों में  ही सो जाते है ,
                                           तब कभी बड़े अरमाँ नही होते थे ,आज अपनी ज़िन्दगी में ही सब खो जाते है।  

तब अपनी छोटी सी दुनिया में ही  खुश रहते थे , कभी चोट या ठोकर भी खाते तो हँस  देते थे ,
            
आज खुद को तलाशते है, इतने बड़े जहां में, ठोकरे खाते है तब भी किसी का सहारा आता है न ध्यान में।  

तब माँ बाप के साये मैं महफूज़ थे ,तब लाड प्यार डाठ को ही , ज़िन्दगी समझते थे ,
                                           आज ज़िन्दगी में अकेले है खड़े ,तो सोचते है वो दिन कितने अच्छे थे। 

जब जानते न थे तो हम भी बहुत सच्चे थे। 
                                              जब न था पता तब हम बच्चे थे। 
  
जब जानते न थे तो ख़ुशी दिल से होती थी ,आज बस दिखावा है 
                                                दिलो में दर्द ,और चेहरे में  एक ख़ुशी का छलावा है। 


Monday, 1 August 2016

खेल की विराट ऱढ़भूमि



अब वक़्त है वो आ चला , जब तिरंगा विश्व में लहराएगा। 

अपने अनोखे तेज से ,वो हर क्षढ  जगमगायेगा। 

स्वर्ण पदक नयोछारता वो  वीर अब दोहराएगा , भारत माता की जय , 

 नारा अब हर कोई  लगाएगा। 

वो डट गए है मैदान पर ,अब वीरता के दाव पर। 

अब  जीत की ललकार है ,  वो जीत कर ही आएगा। 

कोई स्वर्ण ,कोई चाँदी, कोई कास्य  पदक  लाएगा। 

पर हौसला  फिर आने का न उनका डगमगाएगा। 

भारत की  शान बनकर तू  विश्व में अब जायेगा ,

 वो मैदान नहीं रढ़ भूमि है ,तू वीर अब कहलायेगा। 

किसी के घर की बेटी अब भारत की बेटी कहलाएगी ,

कभी साड़ियों  को लहराती घर में , अब तिरंगा  विश्व में फहराएगी। 

कल गुड़ियों से खेलने वाली ,अब विख्यात ऱढ़भूमि में खेल जाएगी। 

सोने ,चाँदी  के पदक से ,भारत माँ को अब सजायेगी।

शान से जब अपनी जन्म भूमि में वो लौट आएंगे ,

सभी देशवासी मिलकर उन्हें गर्व का तिलक लगाएंगे। 

भारत माता की जय भारत माता की जय हम सब साथ नारा ये लगाएंगे,

हर एक  वीर की वीरता की गाथाये हम दोहराएंगे। 



                                                                                                                                   : ज्योत्स्ना सुयाल













Thursday, 23 June 2016

छोड़ चली माँ आज तेरा अंगना

                 मैं छोड़ चली माँ आज तेरा अंगना ,बस ले जा रही हूँ अपनी मीठी सी यादो का सपना।

                 क्यों आँख भर आई है आज मेरे जाने पर , जब जानते है सब यही दस्तूर है सामज का।

             क्यों लग रहा है मैं हो रही हूँ  पराई , जब जानती हु की रिश्ता है मेरा तुझसे अटूट प्यार का।

   क्यों तेरे आँगन पर गिर रही हु ये अनाज के दाने,ये भी पता है न चूका पाऊँगी वो क़र्ज़ तेरे दुलार का।

अब वक़्त के पहियों को कुछ पलो में दोहरा  रही हूँ ,तेरी ममता की लोरी को भीड़ मैं भी गुनगुना रही हूँ।

                            तेरी वो डाठ पर आज बहुत प्यार आ रहा है , तुझसे जुड़ा लम्हा  पुकार रहा है।

                        आज पता चल रहा है कि , तू सिर्फ ममता की मूरत हे नहीं तू कितनी बलवान भी है ।

                                       कभी प्यार को न्योछारती  तो अपने अंश का तूने किया दान भी है।

                                 तेरी इस हँसी  के पीछे के दर्द को आज बहुत अच्छे से समझ रही हूँ ।

                                      माँ के भगवान् से ऊँचे होने का मतलब खुली आँखों से देख रही ।

                                                तू खुश है मेरी ख़ुशी मैं पर कही उदास भी ,

                                                        तू दूर है भीड़ मैं पर मेरे पास भी ।

                                     तू है इस दुनिया की पर क्यों लगती एक रचना महान है,

                                                      तेरा ह्रदय तो समुद्र से भी विशाल है ।

                           आज मुझे तू किसी और को सौंप रही है ,जैसे अपने कलेजे का टुकड़ा दे रही है ।

                               न कभी तुझसे प्यार कोई कर पाएगा मुझे , ये निस्वार्थ प्रेम सदा याद आएगा ।

                तेरी दी हुई सीख से किसी और का घर अब सजाऊंगी ,न कभी तेरे मान को ठेस पहचाउंगी।

                                                       माँ बस एक बिनती करती हु तुझसे ,

भले ही किसी ख़ुशी में तू मुझे अंजान रखना ,पर अपने हर दर्द और दुःख में अपनी इस बेटी को याद रखना ।

                                                                                                                      ज्योत्स्ना सुयाल






पेशावर हमले पर आधारित कविता

हर रोज़ की  तरह घर से निकले थे एक नयी उमंग लिए ,अंजान थे की आने वाला वक़्त क्या जुर्म ढायेगा !

                          माँ का दुलार लिए, पापा की उंगलिया पकड़, चल दिए वो नन्हे कदम !

                                         दरिंदो से अंजान खुशनुमा थे जो हर कदम।

                   एक मंज़र ने पूरी ज़िन्दगी का रुख मोढ दिया , हस्त बस्ते हर एक घर तोड़ दिया !

                             जिस आँगन मैं किलकारियाँ गूंजती थी , अब दर्द की कराह गूंजने लगी ।

                                         लहूलुहान हो गयी दीवारे , साँसे भी नम होने लगी ।

                      हर एक जुबां बस एक शब्द पुकारती रही , माँ मुझे बचा ले, मैं अब शैतानी नहीं करूँगा

                                                   जिस राह तू कहेगी उस राह ही चलुंगा ।

                                      वो लोरियों से भरा घर,अब मातम के सन्नाटे से भर गया,

                       माँ हर किसी से बोलती जा रही , कि मेरा बच्चा आज मुझे अलविदा कह गया ।

जाना सबको है, पर ये दर्दनाक मौत क्यों मिली उन्हें ? आतंकवाद गोली हमला का बिलकुल भी पता न था जिन्हे ।

जहां कभी अरमान सजते थे ,आज अर्थिया सजने लगी , चारो तरफ हर किसी की करआह गूंजने लगी ।

                                                        जाते-जाते हर बच्चा अपनी माँ को कह गया !

माँ ,मैं लाडला था तेरा ,पर उन दरिंदो का नहीं , जीना पड़ेगा तुझे, पर कभी डरकर नहीं ।

                                         डटकर सामना करना, कभी हारना नहीं , मुझे याद करके कभी आंसूं बहाना नहीं ।

मौका मिला तो फिर जनम लूँगा ऐ माँ , और करूँगा आतंकवाद और हमले का नाश ।

                                                                  जो जुर्म धा रहे है धरती पर और कर रहे है मानवता का विनाश।

एक न एक दिन इनके पाप का घड़ा भी फूट जायेगा ,

                                                                    और पेशावर का हर कोन फिर किलकारियों से  गूँज जायेगा ।

                                                                                                                               :ज्योत्स्ना सुयाल





Tuesday, 21 June 2016

पथ

                                                 पथ कठोर है ,पथ का अनन्त कोई छोर  है !

                                              ना हार कर तू बैठ जा , ले प्रतिज्ञा अब हो खड़ा ।
                     
                                            विश्वास होगा जब अटल ,मुश्किलें भी तब जाएँगी टल ।
                                         
                                              तू  ठोकरे भी खायेगा ,खुद को अकेला भी पाएगा ।

                                            पर मत हारना न छोड़ना ,वो प्रतिज्ञा तेरी मत तोड़ना ।

                                             तू कर गुज़र जायेगा जब,हर प्रयत्न याद आएगा तब ।

                                              मत भूलना,अस्तित्व को, निखारना व्यक्तित्व को ।

                                              अभिमान करता है पतन सदियों से दोहराता है ।

                                                न डगमगाना अंत तक ,जायेगा तू अनन्त तक ।

                                                बस ठान ले कर हौसला प्रण है मेरा प्रण है मेरा ........


                                                                                                                                  ज्योत्स्ना सुयाल
                                              

Friday, 4 September 2015

YOU

                                     When i close my eyes , i always wanna DREAM you,
                      When i woke up in the morning i always smile after dreaming YOU.. 

                                    How could i EXPLAIN , how could i EXPRESS...
                              You have just filled  all my dreams and my EMPTINESS ...

                                              Sometimes silly,sometimes naive...
                                        i was totally lost , even there was no SHINE ...

                                            ORDINARY you came into my life,
                                          but that was more and more than nice..

                                                 i shout on you , i cry with you ..
                                        i live with you, i feel my EXISTENCE with you,..

                                           Now my dreams are simple as like as you ...
                                   i WANNA live in the world where only ME and YOU...

Monday, 27 July 2015

नारी





जन्म लेने से  पहले भी , किसी की उम्मीद न थी तू

                                                              जन्म लेने के बाद भी हर किसी की मुस्कान न बनी तू !

हर कदम पर खुद को साबित करती गयी तू,

                                                             फिर भी कभी गर्भ तो कभी समाज में मारी गयी तू !

कभी माँ तो कभी सावित्री बन तूने हर धर्म निभाया ,

                                                            फिर भी ये समाज तेरे उन आंसुओ को समझ न पाया !

तूने अपने हिस्से का भोजन भी अपने लाडले को खिलाया , खुद गीले में सोकर उसे  सूखे में सुलाया !

                                                            पर तेरे बुरे वक़्त में तूने उसे भी सम्मुख न पाया !


अपना परिवार छोड़ तूने दूसरों का परिवार सजाया ,

                                                          जिन नन्हे हाथो में गुड़िया थी उसने घर आँगन महकाया!

भगवान से भी ऊँचा स्थान तूने इस जग में पाया ,

                                                         फिर भी हर घर ने तेरा गला दबाया !

न जन्म लेने दिया , न जीवन जीने दिया ,

                                                       कभी भ्रूढ़ हत्या तो कभी दहेज़ की आग में झोक दिया !

तू सहनशीलता की मूरत है तूने हर कदम पे ये दिखाया  ,

                                                       कभी परिवार  की कड़वी बातें कभी समाज का बहिस्कार पाया !

ए नारी तेरी व्यथा न कोई समझ पाया ,
   
                                                   ये जानके भी क़ि तुझसे ही सबने ये जन्म पाया !

अपनी हर पीड़ा को अपनी मीठी सी मुस्कान से छुपाया ,


                                                ए  नारी तू ब्रह्माण्ड है तुझे कोई समझ न पाया !






Wednesday, 8 July 2015

कर्तव्य



                   प्रबल शक्ति से झनझोर  है मन  की अलौकिक   कल्पना ,
  
                                                     प्राण त्याग मत निश्चय मिलेगा लक्ष्य  तुझे तेरा कभी !

                   कर्त्तव्य से मुख मोढ़ 
ना   , 
                                                            तूफ़ान का रूख मोड़ना !


                   प्रण त्याग मत निश्चय मिलेगा लक्ष्य ततुझे तेरा कभी !


                    

                    पत्थर मिलेंगे रास्तो  मे तुझको  डराने लिए ,

                                                                          मत हारना कर सामना वो लक्ष्य पाने के लिए!


                    प्रण त्याग मत निश्चय मिलेगा लक्ष्य तुझे तेरा कभी !


                    कितनी जटिल कठिनाइयों को पार कर जायेगा  तू ,


                                                                          मुश्किलो को वार कर स्वनिर्मित अस्तित्व पायेगा !


                    प्रण त्याग मत निश्चय मिलेगा लक्ष्य ततुझे तेरा कभी !
                   
                    वो कश्तियाँ भी क्या जो टूट जाए  हार कर ,

                                                                     जीत लेना ये जंग तू प्राण को भी वार  कर !


                      प्रण त्याग मत निश्चय मिलेगा लक्ष्य तुझे तेरा कभी !


            

Friday, 10 April 2015

Abhilasha


Abhilasha


Main nadee sa beh chala hu,
zese sahil banke thehra hu .

lahro se apni dastaan baya hai,
phir bhi aankho mein ek haya hai,


Bus khwab hai sagar mein doob jane ka,
kya manzar hai nayi rut aane ka .

jee chahe bus beh chalu kahi sang tere,
shubahe hui teri shab bhi na rahe mere.

tu jal mera , mein bahaav hu,
mein bahunga chir annant.

tu pal mera ,mein thahraav hu,
har shad  rahunga sang sang.

annant ka gathbandhan hai,
tarango ka ye manthan hai.

mann mein nayi umang hai,
bhawo mein ghulta koi rang hai.

bhaav vibhore ho gaya mann,
is ujjaval si gatha se .

bajne lage dhol mridang,
apne antar mann ki vyatha se.

nishchay liye mann mein,aab behta he chala hu.
tujhme sama jane ka har prayatn kar raha hu ...

Thursday, 15 January 2015

bachpan

Kitna pyara tha vo bachpan

Jab khelne ko ghar ka angan tha
Udne ko sara aasman tha
Jab koi yu bevajah rulata na tha
Vaha apne sapno ka gulista sa tha

Kitna pyara tha vo bachpan
Jab maa ki dath  se bachne k liye papa ka vo lad  pyar tha
Jab choti choti cheezo se khushiyo ka sansaar tha

Kitna pyara tha vo bachpan

Vo mitti k ghar ko banana,
Vo pattharo se unhe sajana
Vo school ko na jane k bahana
Vo teacher ka dath ke rulana

Kitna pyara tha vo bachpan

Kash vo suhane  din phir laut jaye
Vo khushyo se angan mera  phir  bhar jaye

Bachpan to chala gaya par vo masumiyat na jaye.....
Or isi  tarah ye din hum roz manaye....

Saturday, 4 October 2014

Bharat ka saccha NAYAK

Ek roti ki keemat samjh,

      irado ko pura karne nikla tha vo balak .

Na karm karne se sharmata,

  jiske mastak ka tez har shad jagmagata!

Apne drid nischay ko drishti me liye ,

       Vo balak ek shad na dagmagata...

Maa ka ashirvad liye,

       nikla tha drid sankalp liye .

Badal dunga desh ko maa ,

       Har baar yhi dohrata .

Sampoorn jeewan apni janni par vaar kar,

Chal pada apni raah mein har mushkilo ko paar kar.

Apne jawaa kadmo se usne badal di tasveer apne rajya ki,

Ab sankalp or badh chala,

 chala badalne kaya sampun samaj ki.

Ban gaya rajneta, par na bhoola apni maa ki chaya,

Duniya ki rangat ko chorr pehle maa ki chokhat par aaya.

Bola maa tujhko samjha tabhi bharat maa ka dard samjh paya

Tune mujhe janm diya tere ashirvad ki vajah se mein ye kar paya.

Maa ki prerna or ashirwad ko liye ,

Chal pada vo dharti maa k liye..

Aab desh ko brashtachar rahit banane ,

Garibo ko sahara dekar kabil karne.

Vo lekar aaya hai ek nahi umang ....

kehta  hai mein rajneta hu badal sakta hu bharat ki tasveer ,

Par Ye sapna tabhi  hoga pura jab  jud jaye isme bharat ka har ek veer.

Desh ko swach banane ke liye  khud jisne  pehle kadam badhaya,

Bhart maa ki seva ko kai neta aaye par ese kabhi na aaya.

Kahaniyo mein bharat  sone ki chidiya thi,
Ye to sabne sunaya,

Us sapne ki vastavikta ko jisne hume dikhlaya.

Namo namo ka nara aab har budhe bacche ki jubaan par chaaya,

Dhanya hui bharat maa jab se ye saccha nayak aaya.


This is tribute to our Prime Minister From my side....... 

Thursday, 14 August 2014

Azadi ke sahi Mayne

Azadi daman mein hai par hatho mein nahi,
Khushiya jag mein hai par har angan mein nahi,

Kisi ko roti bebas karti hai,
             Kisi ko bhari zebe bhi kam lagti hai
Koi footpath par guzara karta hai,
     Koi makhmali gaddo ka sarahna rakhta hai.

Koi sarhad par Zindagi lagaye betha hai,
          To koi lachaar ko dabaye betha hai.
Kisi ki beti dar se bahar nahi nikalti,
    Atyachar karne mein kisi kisi ki ruh nhi darti.

Koi sarhad ki goliyo ko seene se laga raha hai,
Koi bhrastachaar se dharti maa ko rula raha hai.

Vo azadi kab aayegi...
Jab koi bhooka na hoga,
Jab koi darta na hoga,
Jab kisi ki raat footpath par na hogi,
Jab kisi ki behan bevajh beva na hogi,

Azadi daman mein hai par hatho mein nahi,
Khushiya jag mein hai par har angan mein nahi.

Hume azadi ke mayne ko badalna hoga,
Desh to azad hai hume khud ko azad karna hoga.

Bhrshtachar na karo, na karne do.
Atyachar na saho ,na sehne do .

Ameero ki zebe to bhari hoti hai.
Kabhi kisi ke gareeb ke angan ko bhi hara bhara hone do.

Sahi mayne ek azadi ke yahi hai,

Jo amal kare in bato mein,

Har mayne mein azaad vahi hai....
    

Monday, 21 July 2014

Art Of L!v!ng





Climb the mountain, rise the Sun
                             
           Try to fly, touch the Sky.

Nothing is certain to live a Life...
                           
           Live every moment with full of Hike…

There are lot of ways to endure a zing...

         YOU have to peg it up to pull you intensifying it...

Love yourself first without concerning anyone…

       Hold out all your dreams with a full balanced run…

You have to face challenges, just keep it in your mind…

       Gather all your strength and get it bind….

You may fall on these turns while you rise up..

       But it will help you, keep it up …

The one who complete all the stages with hard work and without any fear...


Will get the best opportunity and life, but those people are rear...!!!!!!

Wednesday, 2 April 2014

LAUT KAR PARINDE GHAR KO CHALE


Laut kar parinde apne ghar ko chale,
                                      Jo gaye the kisi ko dhoondne neele gagan ke tale
Na paya na khoya na ashiyaan banaya
                                       Khwabo ka samandar tere dil mein samaya
Jo hota koi tera to tu laut khali aata nhi,
                                       Tere har sawal ka jawab tu kbhi paata nahi
Kuch patthar k makano ka saya, unpar esa pad gaya
                                       Ashiyan koi banaya tha andhiyo mein beh gaya.
Gar khabar hoti unhe to ye ashiyaan na banate
                                        Har khawab aankho k vo yun he na sazate
Bikhar jana he tha ek din har jude sapne ko
                                        Par cut gaye the parindo k par aab udne ko
Hausle buland the par raste band the
                                        Unchaiyaan choone k liye parinde malangh the.
Anshiyaan choor hua dil bhi toot gaya
                                        Har aaina sapne ka footkar bikhar gaya
Haarkar he sahi par ek umeed ki kiran liye
                                         Laut kar parinde apne ghar ko chale......

Thursday, 31 October 2013

Badalti Soch




Zamana nahi badla logo ki soch badal gayi ,

                      Dilo mein rishto ki tasveer badal gayi

Jin hatho mein mitti ki gudiya thi ,

                      Takniki se hatho ki vo  lakeer badal gayi

Kya hoga e dharti maa aab yaha koi nahi  manta,

                      Tere gusse ke prakop ko koi nahi janta

Tu sehti gayi bhaar na ek baar kaha ,

                       Manushya ke badalte chehre ko har baar saha

Kyon pal pal kaat raha hai tere daman ko ,

                      Zisse sazaya tune har ek ke aangan ko .

Kahi makan to kahi kuch or bana raha hai

                       Tere astitva ko har pal manushya mita raha hai 

Kyon nahi dekhta e manushya tu apni janni ka dard ,

                       Jise har kisi se bacahana tha tera  pehla kartavya .
Na vo bachpan raha  na vo jawani,

                      Na vo kagaj ki kashti na vo pani .

Ye kuch or nahi tabahi ka sandesha hai ,

                      Jo abhi manushya ki ankho se andekha hai

Aab na vo kisse rahe na vo kahani ,

                      Kabhi baad to kabhi darati hai tsunami.

Apne esho aaram k liye dharti ko de raha hai dukh .

                      Nahi janta kya hoga iske krodh ka rukh .

 Badalte logo ne humari janni ko itna dukh diya.


                     Phir bhi vo maa thi usne har dard ghut liya .